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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 19
स्थित्वा तस्मिन् वनचरवधूभुक्तकुञ्ज मुहूर्त प्तोयोत्सर्गंद्रुततर गतिस्तत्परं वर्त्य तीर्णः । रेवां द्रक्ष्यस्युपलविषमे विच्यपादे विशीर्णां भक्तिच्छेदैरिव विरचितां भूतिमङ्गे गजस्य ॥
वन में विचरण करने वालों की स्त्रियों द्वारा उपभुक्त कुओं वाले उस (आम्रकूट पर्वत) पर क्षण भर ठहर कर, जल की वर्षा कर देने से अत्यन्त तीव्र गति वाला होकर, उससे (आम्रकूट से) आगे के मार्ग को पार कर, पत्थरों के कारण उबड़-खाबड़ विध्याचल की तलहटी में फैली हुई नर्मदा नदी को, हाथी के शरीर पर चित्रकारी की रेखाओं के प्रकारों से बनायी गयी शृङ्गार रेखा के समान देखोगे।
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