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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 12
आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं वन्धैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु । काले काले भवति भवतो' यस्य संयोगमेत्य मेघदूतम् स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहर्ज मुञ्चतो वाष्पमुष्णम् ॥
मनुष्यों के वन्दनीय रामचन्द्र जी के चरणों द्वारा ढलानों पर चिह्नित, प्रिय मित्र, इस ऊँचे पर्वत को आलिङ्गन कर विदा लो। समय-समय पर आपका साहचर्य पाकर चिरकाल के वियोग से उत्पन्न गर्म वाध्य (आँसुओ) को छोड़ते हुए जिसके (रामगिरि पर्वत के) प्रेम की अभिव्यक्ति होती है।
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