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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 29
वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिकाञ्चीगुणायाः संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दर्शितावर्तनाभेः । निर्विन्ख्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सन्निपत्य स्त्रीणामाद्यं प्रणयवचनं विश्वमो हि प्रियेषु ॥
तरंगो के चलने से शब्द करते हुए पक्षियों की पंक्ति रूपी करधनी वाली, स्खलन के कारण सुन्दर रूप में (मदमाती चाल से) बहने वाली तथा भँवर रूपी नाभि को दिखाने वाली निर्विन्ख्या नदी के मार्ग में पहुँच कर जल से पूर्ण मध्य भाग वाले हो जाना; क्योंकि स्त्रियों की प्रेमियों के प्रति शृङ्गार-चेष्टा (हाव-भाव) ही प्रथम प्रणय वाक्य होता है।
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