ये संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्गभङ्गाय तस्मिन् मुक्ताध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम् ।
तान्कुर्वीथास्तुमुलकरकावृष्टिपातावकीर्णान् के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः ॥
उस (हिमालय) पर क्रोध के कारण उछलने में वेग वाले जो शरभ रास्ता छोड़ देने वाले आपको शीघ्र अपने अङ्गों को नष्ट करने के लिए लान्घे उन्हें भयङ्कर ओलों की वर्षा गिराकर तितर-बितर कर देना अथवा व्यर्थ काम करने वाले कौन तिरस्कार के विषय नहीं होते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।