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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 57
ये संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्गभङ्गाय तस्मिन् मुक्ताध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम् । तान्कुर्वीथास्तुमुलकरकावृष्टिपातावकीर्णान् के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः ॥
उस (हिमालय) पर क्रोध के कारण उछलने में वेग वाले जो शरभ रास्ता छोड़ देने वाले आपको शीघ्र अपने अङ्गों को नष्ट करने के लिए लान्घे उन्हें भयङ्कर ओलों की वर्षा गिराकर तितर-बितर कर देना अथवा व्यर्थ काम करने वाले कौन तिरस्कार के विषय नहीं होते।
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