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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 23
उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मत्प्रियार्थं यियासोः कालक्षेपं ककुभसुरभौ पर्वते पर्वते ते । शुक्लापाङ्गैः सजलनयनैः' स्वागतीकृत्य केकाः प्रत्युद्यातः कथमपि भवान् गन्तुमाशु व्यवस्येत् ।।
(हे) मित्र! प्रिय (अभीष्ट) के लिए शीघ्र जाने के इच्छुक भी तुम्हें कुटज के पुष्पों से सुगन्धित प्रत्येक पर्वत पर देर हो जाने की सम्भावना कर रहा हूँ। (आनन्द के) आँसुओं से युक्त नेत्रों वाले मयूरों द्वारा अपनी वाणी को स्वागत का शब्द बनाकर अगवानी किए गये आप शीघ्र जाने का प्रयत्न करना।
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