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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 25
तेर्षा दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा । तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात् सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि ॥
दिशाओं में प्रसिद्ध विदिशा नाम वाली उसकी (दशार्ण प्रदेश की) राजधानी पहुंचकर तुरन्त कामुकता के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करोगे, क्योंकि (तुम) मधुर, चंचल तरङ्गों वाले वेत्रवती के जल को भूभङ्ग युक्त मुख की भांति तट प्रान्त में गर्जन से सुन्दर लगते हुए पान करोगे।
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