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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 20
तस्यास्तिक्तै र्ध्वनगजमदैर्वासितं वान्तवृष्टिर्जम्बू कुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः । अन्तःसारं घन तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ॥
वर्षा कर चुके हुए (तुम) तीव्र गंध वाले, जंगली हाथियों के मद से सुगन्धित (और) जामुनों के कुओं द्वारा रोके गये वेग वाले उसके (नर्मदा के) जल को लेकर जाना। हे मेघ! वायु अन्दर बल से युक्त तुझको हिलाने में समर्थ न हो सकेगा; क्योंकि खाली हुए सब हल्के होते हैं (तथा) भरा हुआ होना भारीपन का कारण होता है।
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