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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 28
वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः । विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥
उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किये हुए आपका मार्ग यद्यपि टेढ़ा (हो जायेगा), (फिर भी) उज्जयिनी के प्रासादो के ऊर्ध्व भागों के परिचय से पराङ्‌मुख मत होना। वहाँ नगर की सुन्दरियों की बिजली की रेखा के चमकने से चकित चञ्चल चितवन वाले नेत्रों से यदि (तुमने) आनन्द नहीं लिया तो (तुम निश्चित ही) ठगे गये।
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