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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 40
गच्छन्तीनां रमणवसतिं योषितां तत्र नक्तं रुद्धालोके नरपतिंपथे सूचिभेद्यैस्तमोभिः । सौदामन्या कनकनिकषस्निग्धया दर्शयोर्वी तोयोत्सर्गस्तनितमुखरो' मा स्म भूर्विक्लवास्ताः ॥
वहाँ (उज्जयिनी में) रात्रि में प्रेमियों के घर जाती हुई स्त्रियों को अत्यन्त गाढ़े अन्धकार के कारण दिखायी न देने वाले राजमार्ग को कसौटी पर खींची गयी स्वर्ण रेखा के समान चमकने वाली बिजली से भूमि को (मार्ग को) दिखलाना। जलवर्षा तथा गर्जन द्वारा शब्दायमान (वाचाल) मत होना। वे स्त्रियां डरपोक होती हैं।
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