गम्भीरायाः पयसि सरितश्चेतसीव प्रसन्ने छायात्माऽपि प्रकृतिसुभगो लप्स्यते ते प्रवेशम् ।
तस्मादस्याः कुमुदविशदान्यर्हसि त्वं न धैर्यान्मोधीकर्तुं चटुलशफरोद्वर्तनप्रेक्षितानि ।।
गम्भीरा नदी के निर्मल चित्त की तरह जल में स्वभाव से सुन्दर तुम्हारा छाया शरीर भी प्रवेश प्राप्त करेगा, इस कारण से तुम उसकी (गम्भीरा नदी की) कुमुद की तरह उज्ज्वल चञ्चल मछलियों की उछाल रूपी चितवनों को, धीरता के कारण निष्फल करने के योग्य नहीं हो।
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