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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 45
त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसितवसुधागन्धसम्पर्करम्यः स्रोतोरन्यध्वनितसुभगं दन्तिभिः पीयमानः । नीचैर्वास्यत्युपजिगमिषोर्देवपूर्वं गिरिं ते शीतो वायुः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम् ।।
तेरे बरसने से फूली हुई पृथ्वी की गंध के संसर्ग से रमणीय हाथियों द्वारा नाक के छिद्रों में शब्द के साथ सुन्दर रूप में पिया जाता हुआ, वन के गूलरों को पकाने वाला शीतल वायु देवगिरि की ओर जाने के इच्छुक तेरे नीचे वहेगा (चलेगा)।
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