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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 55
आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्श्चैर्मृगार्णा तस्या एव प्रभवमचलं प्राप्य गौरं तुषारैः । वक्ष्यस्यध्वश्रमविनयने तस्य श्रृङ्गे निषण्णः शोभां' शुघ्नत्रिनयनवृषोत्खात्पङ्कोपमेयाम् ।।
बैठे हुए मृगों की कस्तूरी की गंध से सुगन्धित शिलाओं वाले, उस (गङ्गा) के ही उद्गमस्थल, बर्फ से श्वेत पर्वत को प्राप्त करके मार्ग की थकावट को दूर करने वाले उसके शिखर पर स्थित (तुम) श्वेत शिव के बैल द्वारा उखाड़ी गयी कीचड़ से तुलना किये जाने योग्य शोभा को धारण करोगे।
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