वेणीभूतप्रतनुसलिला पाण्डुच्छाया तामतीतस्य सिन्धुः तटरुहतरुभ्रंशिभिर्जीर्णपर्णैः ।
सौभाग्यं ते सुभग विरहावस्थया व्यञ्जयन्ती । कायं येन त्यजति विधिना स त्वयैवोपपाद्यः ॥
वेणी के समान बने हुए क्षीण जल वाली, तट पर उगे हुए वृक्षों से गिरने वाले सूखे पत्तों से पीली कान्ति वाली (काली) सिन्धु नदी उसको (निर्विख्या को) पार किये तेरे सौभाग्य को (अपनी) विरह की दशा से प्रकट करती हुई, जिस उपाय से (अपनी) क्षीणता छोड़ दे, हे सौभाग्यशाली मेघ! वह तुम्हें करना ही चाहिए।
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