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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 38
पादन्यासैः क्वणितरशनास्तत्र लीलावधूतैरत्नच्छायाखचितवलिभिश्चामरैः क्लान्तहस्ताः । वेश्यास्त्वत्तो नखपदसुखान्प्राप्य वर्षाग्रबिन्दूनामोक्ष्यन्ते त्वयि मधुकर श्रेणिदीर्घान्कटाक्षान् ॥
वहाँ (सन्ध्या-समय में) पैरों की गति के साथ बजती हुई करधनियों वाली, विलासपूर्वक डुलाये हुए, रत्नों की कान्तियों से विभूषित दण्डों वाले चैवरों से थके हुए हाथों वाली वेश्यायें तुमसे नखक्षतों को सुख देने वाली वर्षा की प्रथम बूँदों को प्राप्त करके तुम पर भ्रमरों की पंक्तियों के समान लम्बे कटाक्षों को छोड़ेंगी।
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