(हे) मेघ! अब, पहले कहते हुए (मुझसे) तुम्हारी (अपनी) यात्रा के अनुकूल मार्ग को सुन लो, जिसमें (मार्ग में) बार-बार थक जाने पर पर्वतों पर पैर रखकर (विश्राम करके) तथा बार-बार क्षीण होने पर नदियों के हल्के जल का उपभोग कर (पीकर) जाओगे। उसके बाद (मार्ग सुनने के बाद) कानों के द्वारा पिये जाने वाले (सुने जाने वाले) मेरे सन्देश को सुनोगे।
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