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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 13
मार्ग तावच्छृणु कथयतस्त्वत्प्रयाणानुरूपं संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् । खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य ॥
(हे) मेघ! अब, पहले कहते हुए (मुझसे) तुम्हारी (अपनी) यात्रा के अनुकूल मार्ग को सुन लो, जिसमें (मार्ग में) बार-बार थक जाने पर पर्वतों पर पैर रखकर (विश्राम करके) तथा बार-बार क्षीण होने पर नदियों के हल्के जल का उपभोग कर (पीकर) जाओगे। उसके बाद (मार्ग सुनने के बाद) कानों के द्वारा पिये जाने वाले (सुने जाने वाले) मेरे सन्देश को सुनोगे।
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