संध्या की पूजा के बाद शिव के (ताण्डव) नृत्य के आरम्भ में, ताजे जपा के पुष्प के समान लाल संध्याकालीन कान्ति को धरण करते हुए ऊँचे भुजा रूपी वृक्षों के बन को मण्डलाकार रूप में व्याप्त करके, पार्वती द्वारा भय रहित निश्चल नेत्रों से देखी गयी भक्ति वाले (तुम, उस शिव की) गीले हस्ति-चर्म की इच्छा को दूर कर देना।
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