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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 39
पश्चादुच्चैर्भुजतरुवनं मण्डलेनाभिलीनः सान्ध्यं तेजः प्रतिनवजपापुष्परक्तं दधानः । नृत्यारम्भे हर पशुपतेरार्द्रनागाजिनेच्छां शान्तोद्वेगस्तिमितनयनं दृष्टभक्तिर्भवान्या ॥
संध्या की पूजा के बाद शिव के (ताण्डव) नृत्य के आरम्भ में, ताजे जपा के पुष्प के समान लाल संध्याकालीन कान्ति को धरण करते हुए ऊँचे भुजा रूपी वृक्षों के बन को मण्डलाकार रूप में व्याप्त करके, पार्वती द्वारा भय रहित निश्चल नेत्रों से देखी गयी भक्ति वाले (तुम, उस शिव की) गीले हस्ति-चर्म की इच्छा को दूर कर देना।
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