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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 33
हारांस्तारांसतरलगुटिकान् कोटिशः शङ्खशुक्तीः शष्पश्यामान्मरंकतमणीनुन्मयूखप्ररोहान् । दृष्ट्वा यस्यां विपणिरचितान्विद्रुमाणी च भङ्गान् संलक्ष्यन्ते सलिलनिधयस्तोयमात्रावशेषाः ॥
जिस (उज्जयिनी) में करोड़ों की संख्या में बाजारों में (बिक्री के लिए) सजाये गये, शुद्ध मध्यमणि वाले हारों को, शङ्ख और सीपियों को, घास के समान हरे, अङ्कुरों के समान ऊपर को उठी हुई किरणों से चमकती हुई मरकत मणियों को और मूंगों के टुकड़ों को देखकर समुद्र केवल जलमात्र शेष रह गया हो, (ऐसा) दिखायी देता है।
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