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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 41
तां कस्याञ्चिद्भवनवलभौ सुप्तपारावतायां नीत्वा रात्रिं चिरविलसनात्खिन्नविद्युत्कलत्रः । दृष्टे सूर्ये पुनरपि भवान्वाहयेदध्वशेषं मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥
बहुत देर तक चमकने के कारण थकी हुई बिजली रूपी स्त्री वाले आप, सोये हुए कबूतरों वाली किसी महल की छत पर वह रात्रि बिताकर सूर्य के दिखायी देने पर पुनः शेष मार्ग को तय करना। (क्योंकि) मित्र के प्रयोजन का कार्य स्वीकार कर लेने वाले (व्यक्ति) विलम्ब नहीं करते।
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