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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 51
ब्रह्मावर्त जनपदमथ च्छायया गाहमानः क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुने कौरवं तद्भजेथाः । राजन्यानां शितशरशतैर्यत्र गाण्डीवधन्वा धारापातैस्त्वमिव कमलान्यभ्यवर्षन्मुखानि ।।
इसके बाद ब्रह्मावर्त नामक जनपद में (अपनी) छाया द्वारा प्रवेश करते हुए (तुम) क्षत्रियों के युद्ध के सूचक कुरुक्षेत्र का सेवन करना, जहाँ गाण्डीव धनुष को धारण करने वाले (अर्जुन) ने असंख्य तीक्ष्ण बाणों की राजाओं के मुखों पर वर्षा की थी, जिस प्रकार तुम जलधाराओं की वर्षा कमलों पर करते हो।
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