मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 54
तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि' पश्चार्धलम्बी त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः । संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ स्यादस्थानोपगतयमुनासङ्गमेवाऽभि'रामा ॥
देवों के हाथी के समान आकाश में पिछले आये भाग (के सहारे) से लटके हुए तुम यदि उसके (गङ्गा के) स्वच्छ स्फटिक के समान निर्मल जल को तिरछे होकर पीने का विचार करोगे तो वह (गङ्गा) तुरन्त ही प्रवाह में साथ-साथ चलती हुई आपकी परछाईं से, (प्रयाग से) भिन्न स्थान में यमुना सङ्गम को प्राप्त हुई-सी सुन्दर हो जायेगी।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें