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अध्याय 9 — नवमोल्लासः

कुलार्णव
121 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! हे करुणानिधे! योग और योगीश के लक्षण मैं सुनना चाहती हूँ तथा कुलभक्त की पूजा करने का फल मुझे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से योग साक्षात् प्रकट होता है।
ध्यान स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार का कहा गया है। साकार का ध्यान स्थूल है और निराकार का ध्यान सूक्ष्म कहा जाता है।
स्थूल ध्यान से बुद्धि निश्चित होती है और स्थूल ध्यान से मन स्थिर होता है तथा दोनों स्थूल एवं सूक्ष्म ध्यान से भी मन निश्चल होता है।
हाथ, पैर, पेटादि अङ्ग और अस्थि से रहित सर्वतेजोमय, सच्चिदानन्द निष्कल परमेश्वर का ध्यान करे।
न उसका उदय होता है, न अस्त। न बढ़ता है, न घटता है। वह स्वयं प्रकाश है और बिना साधन के अन्यों को प्रकाशित करता है।
सत्ता मात्र उस अदृश्य, अवस्था हीन जिस रूप का केवल मन से अनुभव होता है, उस ज्ञान को 'ब्रह्म' कहा गया है।
वायुसञ्चार को रोक कर, पत्थर के समान स्थिर हो, परम जीव के एक धाम को जानने वाला 'योगविद्' 'योगी' कहलाता है।
जिस ध्यानावस्था में पदार्थ मात्र भासित हो, शान्त सागर के समान स्थिति हो और स्वरूप का अभाव हो जाय, वह 'समाधि' कही जाती है।
किसी भी चिन्तन से तत्त्व प्रकाशित नहीं होता, वह स्वयं ही प्रकाशित होता है। तत्त्व के स्वयं प्रकाशित होते ही तत्क्षण उसमें तन्मय हो जाय।
स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में जो सोए हुए के समान व निःश्वास और श्वास से रहित रहता है, वह निश्चय ही 'मुक्त' है।
इन्द्रियसमूह को निष्क्रिय रखकर अपनी आत्मा में मन को जो लीन रखता हुआ मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है।
वह साधक जो न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्पर्श करता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन में कोई सङ्कल्प होता है, न कुछ भी जानता है और न काष्ठवत् कुछ अनुभव करता है - इस प्रकार जो शिव में अपनी आत्मा को लीन रखता है, वह संसार में 'समाधिस्थ' कहा जाता है।
जीवात्मा और परमात्मा में अभेद जिस प्रकार जल में जल, दूध में दूध और घी में घी डालने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध है।
जिस प्रकार ध्यान की शक्ति से कीड़ा भी भौरा बन जाता है, उसी प्रकार समाधि की शक्ति से मनुष्य ब्रह्मभूत हो जाता है।
दूध से निकाला हुआ घी जैसे पुनः उसमें डालने से पहले जैसा मिश्रित नहीं होता, वैसे ही गुणों के द्वारा अलग की गई आत्मा इस संसार में अलग कही जाती है।
जिस प्रकार गहरे अँधेरे में यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, उसी प्रकार अन्यमनस्क योगी प्रपञ्च को नहीं देखता।
जैसे आँख बन्द रहने पर प्रपञ्च नहीं दिखाई देता, वैसे ही आँख खुली होने पर भी साधक को वह प्रपञ्च दिखाई न दे, यही ध्यान का लक्षण है।
जिस प्रकार लोग अपने देह की खुजली का अनुभव करते हैं, उसी प्रकार परब्रह्म स्वरूपी साधक क्रियाशील विश्व को जानता है।
वर्णों से अतीत परम तत्त्व को जान लेने पर सभी मन्त्र अपने अधिष्ठातृ देवताओं सहित साधक के दास बन जाते हैं।
आत्मा से एक भाव से निष्ठा रखने वाले साधक की जो भी चेष्टा होती है, वह पूजा स्वरूपा ही होती है; जो भी बात वह करता है, वह मन्त्र स्वरूप होता है और जो कुछ देखता है, वह ध्यान स्वरूप होता है।
परमात्मा के ज्ञात होने पर देहाभिमान दूर हो जाता है और जहाँ कहीं भी ऐसे साधक का मन जाता है, वहाँ उसे समाधि प्राप्त होती है।
उसके हृदय की ग्रन्थि खुल जाती है एवं उसके सभी सन्देह दूर हो जाते हैं। परमात्मा को देख लेने से उसके सभी कर्मों का क्षय हो जाता है।
योगीन्द्र को जैसा निर्मल परम पद प्राप्त होता है, उसके समक्ष देवासुर पद भी प्राप्त होने पर ग्रहण करने योग्य नहीं है।
जो सर्वव्यापी, शान्त, आनन्दमय, अव्यय को देख लेता है, उसे कुछ भी पाने या जानने को नहीं बचता।
ज्ञान विज्ञान के प्राप्त होने पर, हृदय में ज्ञेय की स्थिति होने पर और शान्ति पद के मिल जाने पर, हे देवि! न योग की आवश्यकता रहती है, न धारणा की।
पब्रह्म को जान लेने पर सभी नियम समाप्त हो जाते हैं। सुगन्धित वायु के मिलने पर पंखे की क्या आवश्यकता? न आसन लगाना पड़ता है, न प्राणायाम करना होता है। यम नियम भी नहीं रहते। स्वयं ही आत्मदर्शन होता रहता है।
योग के मर्मज्ञों ने जीव और आत्मा के ऐक्य को ही 'योग' कहा है। न पद्मासन से और न नासिका के अग्रभाग को देखने से योग होता है।
श्रद्धापूर्वक क्षण मात्र के लिये भी परम पद का ध्यान करने से जो महान् पुण्य होता है, उसकी गणना नहीं की जा सकती।
जो क्षण भर के लिए यह आत्मचिन्तन करता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ', वह अपने सभी पापों को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य के उदय होने से अँधेरा नष्ट होता है।
व्रत, यज्ञ, तप, तीर्थ, दान, देव पूजादि से जो फल होता है, उससे कोटि गुना फल तत्त्व के ज्ञाता को मिलता है।
१. सहजावस्था उत्तम है। २. ध्यान-धारणा की अवस्था मध्यम है। ३. जप - स्तुति की अवस्था अधम है और ४. होम-पूजा की अवस्था अधम से भी अधम है।
तत्त्व का चिन्तन करना उत्तम है। जप की चिन्ता करना मध्यम है। शास्त्र की चिन्ता करना अधम और संसार की चिन्ता करना अधम से भी अधम है। कोटि पूजाओं के बराबर स्तोत्रपाठ है, कोटि स्तोत्रपाठ के बराबर जप है, कोटि जप के बराबर ध्यान है और कोटि ध्यान के बराबर लय (समाधि) है।
न ध्यान से श्रेष्ठ मन्त्र है, न आत्मा से श्रेष्ठ देवता है, न अनुसन्धान से श्रेष्ठ पूजा है और न तृप्ति से श्रेष्ठ कोई फल है।
क्रिया की हीनता ही श्रेष्ठ पूजा है, मौन ही श्रेष्ठ जप है, चिन्ता हीनता ही श्रेष्ठ ध्यान है और इच्छारहित होना ही श्रेष्ठ फल है।
मन्त्रोदक के बिना सन्ध्या, पूजा और होम के बिना जप - इस प्रकार योगी नित्य उपचारों के बिना पूजा करे।
सङ्गहीन और उपाधियों से रहित होकर निज स्वरूप में तल्लीन रहता हुआ योगी परम तत्त्व का ज्ञाता होता है।
हे देवि! देह देवालय है और जीव सदाशिव है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को छोड़कर साधक को 'सोऽहं' भाव से पूजन करना चाहिए।
जीव शिव है, शिव जीव है - वह जीव केवल शिव है। पाशों से बंधा हुआ 'जीव' माना जाता है और पाशों से मुक्त 'सदाशिव' कहलाता है। जिस प्रकार भूसी से युक्त धान होता है और भूसी के दूर हो जाने पर चावल कहलाता है, उसी प्रकार कर्मों से बँधा हुआ 'जीव' और कर्मों से छूटा हुआ 'सदाशिव' माना जाता है।
विप्रों का देवता अग्नि में, मनीषियों का हृदय में, अल्पबुद्धि लोगों का मूर्तियों में और आत्मज्ञानियों का देवता सर्वत्र रहता है।
जो निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता रहित 'योगीन्द्र' है। इच्छाहीन, सदा सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, देह में परदेश के समान रहने वाला परम तत्त्व का ज्ञाता 'योगी' है।
सङ्कल्प-विकल्प से रहित और उपाधि-वस्त्रादि से उदासीन, अपने स्वरूप में तल्लीन, परम तत्त्व का ज्ञाता 'योगी' है।
हे कुलेशानि! लँगड़े, अन्धे, बहरे, नपुंसक, पागल और मूर्खादि के समान रहता है वह तत्त्वज्ञ 'योगी' है।
पञ्चमुद्राओं (द्रव्यों) से उत्पन्न परमानन्द में मग्न रहने वाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा को अपने में देखता रहता है।
अलि (मद्य), मांस और अङ्गनासङ्ग (मैथुन) में जो सुख मिलता है, वह ज्ञानियों के लिये तो पुण्य है किन्तु मूर्खों के लिये पाप।
सदा मांस मद्य के उल्लास में रहने वाला, सदा परम तत्त्व का चिन्तन करने वाला और सदा संशयों से दूर रहने वाला 'कुलयोगी' कहा जाता है।
मद्यपान करता हुआ, मांस खाता हुआ, स्वेच्छाचार में लगा हुआ और 'मैं' 'तुम' तथा 'वह' में ऐक्यभाव का चिन्तन करता हुआ वह सदा सुखी रहता है।
मांस और मद्य की सुगन्धि से जिसका मुख रहित है, वह प्रायश्चित का भागी होता है। उसका त्याग करे, वह 'पशु' ही है, इसमें सन्देह नहीं।
जब तक मद्य की गन्ध है, तब तक पशु साधक स्वयं पशुपति स्वरूप है। मद्य मांस की सुगन्ध के बिना साक्षात् पशुपति भी पशु के समान होते हैं।
संसार में निकृष्ट को उत्कृष्ट मानना और उत्कृष्ट को निकृष्ट मानना - महात्मा भैरव ने इसी को 'कुलमार्ग' निर्दिष्ट किया है।
अनाचार सदाचार है, अकार्य ही उत्तम कार्य है, हे कुलेश्वरि! असत्य भी कौलिकों के लिये सत्य होता है। अपेय भी पेय है, अभक्ष्य भक्ष्य है और हे कुलेश्वरि! अगम्य भी कौलिकों के लिये गम्य होता है।
हे कुलेश्वरि! कौलिकों के लिये न विधि है, न निषेध, न पुण्य है, न पाप और न स्वर्ग है, न नरक।
अनभिज्ञ विशेषज्ञ होता है, दरिद्र धनी है और हे कुलेश्वरि! नाशवान् होते हुये भी कौलिक वृद्धि को प्राप्त करते हैं।
शत्रु भी मित्र बन जाते हैं, राजा प्रत्यक्ष सेवा करते हैं और हे कुलेश्वरि! सभी लोग कौलिकों को अपना बन्धु मानते हैं।
प्रतिकूल अनुकूल हो जाते है, सभी अभिमानी प्रणाम करते हैं और हे कुलेश्वरि! बाधा डालने वाले कौलिकों का काम बनाने वाले हो जाते हैं।
गुणहीन गुणी, अकुलीन कुलीन और अधर्मी भी कौलिकों के लिये हे कुलेश्वरि! धर्मवान् बन जाते हैं। मृत्यु वैद्य बन जाती है, घर साक्षात् स्वर्ग हो जाता है और हे कुलेश्वरि! स्त्रियों का सङ्ग कौलिकों के लिये पुण्यकारक हो जाता है।
यहाँ अधिक कहने से क्या, हे प्रिये! कुलयोगीश्वर के सभी सङ्कल्प सिद्ध होते हैं, इसमें सन्देह करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
एक कौल योगी जहां कहीं भी रह सकता है। किसी भी वेष में दिखाई पड़ता है और सभी से विना देखे रहता है। हे कुलेश्वरि! वह किसी भी आश्रम में स्थित रह सकता है। वह 'कुलयोगी' होता है।
विविध वेषभूषा में, लोगों के हितकारी योगीजन अज्ञात रूप से इस पृथ्वी पर भ्रमण करते रहते हैं।
हे कुलेश्वरि! वे एक बार भी अपने को प्रकट नहीं करते और उन्मत्त, मूक, जड़ के समान लोकों के बीच निवास करते हैं।
इस संसार में वे अलक्ष्य ही रहते हैं, जैसे आकाश में सूर्य चन्द्र की गति। नक्षत्रों और ग्रहों के समान ही कुलयोगियों का हाल है।
हे देवि! जैसे आकाश में पक्षियों की और जल में जलचर प्राणियों की गति दिखाई नहीं देती, वैसा ही योगियों का आचरण है।
हे प्रिये! 'कुलयोग' के मर्मज्ञ असन्त के समान बोलते हैं, मूर्खी के समान घूमते फिरते हैं और पापियों के समान दिखाई देते हैं। जिससे लोग उनकी उपेक्षा करें और उन्हें किसी सङ्ग में न पड़ना पड़े। वे कुछ भी नहीं बोलते । ऐसा योगी आचरण करते हैं। क्योंकि वे वस्तुतः योगी होते हैं। हे महेश्वरि! मुक्त होते हुए भी वे बच्चे के समान क्रीड़ा करते हैं, मूर्ख के समान आचरण करते हैं और उन्मत्त के समान बात करते हैं। जिससे लोग हँसें, निन्दा करें और दूर से ही देखकर चले जायें - ऐसा आचरण योगी करते हैं।
कहीं शिष्ट रूप में, कहीं भ्रष्ट रूप में, कहीं भूत पिशाच के समान - इस प्रकार योगी नाना वेश धारण कर पृथ्वी पर घूमता रहता है। योगी लोककल्याण के लिये भोग करता है। वे स्वयं की अपनी इच्छा से भोगों को नहीं भोगते हैं। वे लोगों को अनुगृहीत करते हुए इस पृथ्वी पर क्रीड़ा करते हैं।
जैसे सूर्य सभी को सोख लेता है एवं अग्नि सभी को जलाकर खा जाता है, वैसे ही योगी सभी भोगों को भोगकर भी पापों से लिप्त नहीं होता।
जैसे वायु सभी को छूता है, आकाश सभी जगह है और नदी में सभी नहाते हैं, वैसे ही योगी सदा पवित्र रहता है।
जैसे गाँव में गया हुआ जल नदी से मिलने पर पवित्र हो जाता है, वैसे ही म्लेच्छ के घर का अन्नादि योगी के हाथ में पहुँचकर पवित्र हो जाता है।
हे देवेशि! कुलज्ञान के मर्मज्ञ जिस प्रकार आचरण करते हैं, उसी को आत्मकल्याणेच्छु विद्वान् आदर देते हैं।
जिस मार्ग से योगीश जाते हैं, वही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि सूर्य जिधर निकलते हैं, उधर ही पूर्व दिशा कही जाती है।
जैसे हाथी जिधर जाता है, उधर ही मार्ग बन जाता है, वैसे ही कुलयोगी जैसा आचरण करता है, हे कुलेश्वरि! वही दूसरों के लिए मार्गदर्शक होता है।
टेढ़ी नदी को सीधा करना, उसके प्रवाह को रोकना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वेच्छा से बिहार करने वाले शान्त योगी को मना करने में कोई समर्थ नहीं है।
जैसे मन्त्रबल से युक्त खिलाड़ियों द्वारा नहीं देखा जाता, वैसे ही ज्ञानी इन्द्रियरूपी सर्पों से क्रीडा करते नहीं दिखाई देता।
उत्तम कौलिक के लक्षण-दुःखों से निवृत्त, सन्तुष्ट, निर्द्वन्द्व और मत्सरहीन होकर जो कुलज्ञान में तन्मय, शान्त और आपके भक्त होते हैं, वे 'कौलिक' हैं।
मद, क्रोध, दम्भ, आशा, अहङ्कार से हीन, सत्यवादी कौलिकेन्द्र इन्द्रिय के वशवर्ती न होकर जितेन्द्रिय होते हैं।
कुल की प्रशंसा होने पर वे रोमाञ्चित हो उठते हैं, उनका स्वर गद्‌गद हो जाता है और आनन्दाश्रु गिरने लगता है। हे देवि! ये ही उत्तम कौलिक कहे गये हैं।
संसार में शिवोक्त कुलधर्म सब धर्मों से श्रेष्ठ है, ऐसे निश्चय से युक्त बुद्धि वाले उत्तम कौलिक कहे जाते हैं।
जो कुलतत्त्व का ज्ञाता है, कुलशास्त्र का मर्मज्ञ है, वह कुलार्चन में तत्पर रहता है और हे प्रिये! वही कौलिक है, अन्य नहीं।
कुलभक्तों, कुलज्ञानियों, कुलाचार वालों और कुल्व्रतों को देखकर जो प्रसन्न होता है, वही कौलिक मुझे प्रिय है।
तत्त्वत्रय को स्वीकार करने से, मूलमन्त्र के तत्त्वार्थ को जानने वाला, देवता और गुरु का भक्त दीक्षा के द्वारा कौलिकं होता है।
हे प्रिये! सारे लोकों में कुलाचार्य का दर्शन दुर्लभ है। पुण्यों के सुफलित होने पर ही उसका दर्शन मिलता है, अन्यथा नहीं।
स्मरण करने से, कीर्तिगान से, दर्शन करने से, वन्दना करने से और वार्तालाप से कुलधर्मिष्ठ साधक इच्छा मात्र से चाण्डाल को भी पवित्र बना देता है।
हे देवि! जहाँ कुलज्ञानी है, वहीं मैं आपके साथ रहता हूँ, भले ही वह सर्वज्ञ हो या मूर्ख, उत्तम हो या अधम।
न मैं कैलास में रहता हूँ, न मेरु में और न मन्दिर में। हे भामिनी! कुलज्ञ जहाँ रहते हैं, वहीं मैं रहता हूँ।
माहेश्वर साधक जहाँ हो, वहाँ दूर होते हुये भी जाना चाहिये और प्रयत्न करके उसका दर्शन करना चाहिये क्योंकि वहीं मैं स्थित हूँ।
हे प्रिये! कुलदेशिक बहुत दूर स्थित हों, तो भी उनका दर्शन करना चाहिये और पशु पास ही स्थित हो, तो भी उसे देखना नहीं चाहिये।
कुलज्ञानी जिस देश में निवास करता है, वह पुण्यशाली होता है। उसका दर्शन पूजन करने से इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार होता है।
अपनी सन्तान के घर में कुलज्ञानी को बैठा हुआ देखकर उसके पितर लोग कहते हैं कि 'हम परम गति प्राप्त करेंगे'।
किसानों को अच्छी वर्षा से जैसे सन्तोष मिलता है, उसी प्रकार पितरों को आशा होती है कि 'हमारे कुलों में भी पुत्र या पौत्र कौलिक होगा'।
हे प्रिये ! इस संसार में निश्चय ही वह पुरुष क्षीणपाप होकर धन्य हो जाता है, जिसके पास कुलाचार्य प्रसन्नता से आते हैं।
कौलिकेन्द्र के निकट आने पर हे देवि! योगिनियाँ योगियों सहित सहर्ष पास आती है।
कुलयोगीन्द्र में प्रवेश कर पितृ देवता भोग ग्रहण करते हैं। अतः कुल के मर्मज्ञों का पूजन भक्तिपूर्वक करना चाहिये।
हे देवि! आपकी अर्चा करके जो आपके भक्तों का अर्चन नहीं करते, वे पापी आपके प्रसाद के अधिकारी नहीं होते।
सामने रखा हुआ नैवेद्य देखकर आप स्वीकार करती हैं और हे कमल-लोचने। भक्त की जिह्वा के अग्र भाग से रसों को मैं ग्रहण करता हूँ।
अतः आपके भक्त की पूजा होने से हे देवि! मैं पूजित होता हूँ, इसमें सन्देह नहीं। इसलिये जो मेरी प्रसन्नता चाहते हैं, उन्हें आपके भक्तों की ही पूजा करनी चाहिए।
ज़ो कुछ कुलनिष्ठों के लिए किया जाता है, वह देवताओं के लिए होता है। सुरा कुल की प्रिया है, अतः सभी को उससे कौलिक का अर्चन करना चाहिये।
हे पार्वति! मैं अन्य कहीं भक्तिपूर्वक सुपूजित होने पर उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना कौलिकेन्द्र से पूजित किए जाने पर होता हूँ।
हे प्रिये! कौलिकेन्द्रों की पूजा करने से जो फल मिलता है, वह तीर्थ, तप, दान, यज्ञ एवं व्रतों से नहीं मिलता।
कुलज्ञ की उपेक्षा करने से हानि-जो कुल के ज्ञाता का अपमान करता है, उसके द्वारा किया गया अभीष्ट दान, हवन, पूजन और जप सब व्यर्थ होता है।
जो कुलधर्म में प्रवेश कर कुलाचार को नहीं जानता, उसका घर श्मशानवत् है और वह स्वयं चाण्डाल से भी अधिक पतित होता है।
हे देवि! कुलनिष्ठों को छोड़कर जो अन्य को दान देता है, उसका वह दान निष्फल होता है और दान देने वाला नरक में जाता है। टूटे हुए बर्तन में जल, चट्टान में बोए हुये बीज और राख में किए गये हवन के समान अकौलिक को दिया गया दान व्यर्थ होता है।
यथाशक्ति जो कुछ भी प्रेमपूर्वक विशेष तिथियों में कुलयोगी को दान किया जाता है, उसके फल का वर्णन नहीं किया जा सकता।
हे देवि! जो शुभ दिन में कुलज्ञानियों को स्वयं बुलाकर देवता मानकर गन्ध पुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा कर पञ्चमकारों से भक्तिपूर्वक उन्हें सन्तुष्ट करता है, तो उनके सन्तुष्ट होने पर मैं सन्तुष्ट होता हूँ और मेरे सन्तुष्ट होने पर सभी देवता सन्तुष्ट होते हैं।
हे देवेशि! मधुमत्त कुलयोगी को जो शक्ति रूप से बहन, लड़की या भार्या को प्रदान करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं की जा सकती।
वीरचक्र में प्रयत्नपूर्वक अर्पित मधु परलोक के पथ को अनायास ही प्रशस्त करता है।
पापाचार से युक्त और सभी लोकों से बहिष्कृत मद्य कुलयोगीश्वर को अर्पित करने पर 'कुलद्रव्य' बन जाता है।
हे प्रिये! जिस देश में कुलपूजा करने वाला वीर निवास करता है, वह देश पवित्र हो जाता है। फिर उसके समक्ष रहने की महिमा क्या कही जाय।
कौलिकेन्द्र के एक बार भोजन करने से दाता का पुण्य कोटि गुना अधिक हो जाता है। फिर उसके बहुत बार भोजन करने के पुण्य की तो गणना ही नहीं हो सकती।
अतः सब प्रयत्न करके, सभी अवस्थाओं में, सदैव कुलधर्म में तत्पर हो और कुलज्ञानी का अर्चन करे।
ज्ञानी हो, चाहे अज्ञानी- सभी प्रकार से कर्म की मुक्ति के लिये, जब तक शरीर की स्थिति है, तब तक अपने अपने वर्ण और आश्रम के आचार का पालन करना चाहिए।
कर्म के द्वारा अज्ञान का उन्मूलन होने पर ज्ञान के द्वारा 'शिवत्व' की प्राप्ति होती है और शिव से ऐक्य स्थापित करने वाले की ही मुक्ति होती है। अतः कर्म का समुचित रूप से पालन करे।
अनिन्द्य कर्मों को या नित्य कर्मों को करे। कर्म से मुक्त होकर सुख की आकांक्षा करने वाला कर्मनिष्ठ होकर सुख से रहे।
देहधारी मनुष्य सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। जो कर्मों के फल का त्याग करता है, वही 'त्यागी' कहा जाता है।
इन्द्रियां अपने कर्मों में लगी रहती हैं, ऐसा विचार कर जो अहंभाव को छोड़कर कर्म करते हैं, वे उनमें लिप्त नहीं होते।
ज्ञान हो जाने पर क्रियमाण कर्म तत्त्वज्ञ को स्पर्श नहीं करते, जिस प्रकार जल कमल की पंखुड़ियों से दूर रहता है।
इस प्रकार कर्मनिष्ठ के पुण्य और पाप कर्मों का क्षय हो जाता है और क्रियमाण कर्मों में वह पुनः लिप्त नहीं होता।
हे प्रिये! तत्त्वज्ञान में मग्न साधक को सहजानन्द (स्वाभाविक आनन्द) का लाभ होता है। वह विद्वान् सब सङ्कल्पों का त्याग कर कर्म को छोड़ देता है।
हे प्रिये! जो मूर्ख व्यर्थ ही कर्म काण्ड को छोड़ देते हैं, वे पाखण्डी और अहङ्कारी नरक में जाते हैं।
जिस प्रकार फल को पाकर निस्पृह वृक्ष फूल को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार तत्त्व को पाकर योगी कर्मानुष्ठान का त्याग करते हैं।
जिन साधकों के हृदय में ब्रह्म स्थित है, वे अयुत अश्वमेघों को करके या अयुत ब्रह्महत्याओं से युक्त होकर भी उनके पुण्य या पापों से लिप्त नहीं होते।
पृथ्वी पर जो कर्म जीभ और उपस्थ के लिये हैं, उन कर्मों से उन अङ्गों के त्यागी का क्या सम्बन्ध?
इस प्रकार मैंने योग और योगीश के कुछ लक्षण आपसे संक्षेप में कहे। हे कुलेशानि! आप और क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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