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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 84
सुदूरमपि गन्तव्यं यत्र माहेश्वरो जनः । द्रष्टव्यञ्च प्रयत्नेन तत्र सन्निहितो ह्यहम् ॥
माहेश्वर साधक जहाँ हो, वहाँ दूर होते हुये भी जाना चाहिये और प्रयत्न करके उसका दर्शन करना चाहिये क्योंकि वहीं मैं स्थित हूँ।
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