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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 116
उत्पन्नसहजानन्दतत्त्वज्ञानरतः प्रिये । संत्यक्तसर्वसङ्कल्पः स विद्वान् कर्म सन्त्यजेत् ॥
हे प्रिये! तत्त्वज्ञान में मग्न साधक को सहजानन्द (स्वाभाविक आनन्द) का लाभ होता है। वह विद्वान् सब सङ्कल्पों का त्याग कर कर्म को छोड़ देता है।
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