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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 102
यो देवि स्वयमाहूय कुलज्ञानान् शुभे दिने । अभ्यर्च्य देवताबुद्ध्या गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ मादिभिः पञ्चमुद्राभिः सद्भक्त्या परितोषयेत् । तेषु तुष्टेष्वहं तुष्टस्तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥
हे देवि! जो शुभ दिन में कुलज्ञानियों को स्वयं बुलाकर देवता मानकर गन्ध पुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा कर पञ्चमकारों से भक्तिपूर्वक उन्हें सन्तुष्ट करता है, तो उनके सन्तुष्ट होने पर मैं सन्तुष्ट होता हूँ और मेरे सन्तुष्ट होने पर सभी देवता सन्तुष्ट होते हैं।
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