यो निन्दास्तुतिशीतोष्णसुखदुःखारिबन्धुषु । सम आस्ते स योगीन्द्रो हर्षाहर्षविवर्जितः ॥
निस्पृहो नित्यसन्तुष्टः समदर्शी जितेन्द्रियः । आस्ते देहे प्रवासीव योगी परमतत्त्वत्वित् ॥
जो निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता रहित 'योगीन्द्र' है। इच्छाहीन, सदा सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, देह में परदेश के समान रहने वाला परम तत्त्व का ज्ञाता 'योगी' है।
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