परे ब्रह्मणि विज्ञाते समस्तैर्नियमैरलम् । तालवृन्तेन किं कार्यं लब्धे मलयमारुते ॥
आसिकाबन्धनं नास्ति नासिकाबन्धनं न हि । न यमो नियमो नास्ति स्वयमोमिति पश्यताम् ॥
पब्रह्म को जान लेने पर सभी नियम समाप्त हो जाते हैं। सुगन्धित वायु के मिलने पर पंखे की क्या आवश्यकता? न आसन लगाना पड़ता है, न प्राणायाम करना होता है। यम नियम भी नहीं रहते। स्वयं ही आत्मदर्शन होता रहता है।
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