कहीं शिष्ट रूप में, कहीं भ्रष्ट रूप में, कहीं भूत पिशाच के समान - इस प्रकार योगी नाना वेश धारण कर पृथ्वी पर घूमता रहता है। योगी लोककल्याण के लिये भोग करता है। वे स्वयं की अपनी इच्छा से भोगों को नहीं भोगते हैं। वे लोगों को अनुगृहीत करते हुए इस पृथ्वी पर क्रीड़ा करते हैं।
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