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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 64
क्वचिच्छिष्टः क्वचिद्भष्टः क्वचिद् भूतपिशाचवत् । नानावेशधरो योगी विचरेज्जगतीतले ॥ योगी लोकोपकाराय भोगान् भुङ्क्ते न कांङ्क्षया । अनुगृह्णन् जनान् सर्वान् क्रीडेच्च पृथिवीतले ॥
कहीं शिष्ट रूप में, कहीं भ्रष्ट रूप में, कहीं भूत पिशाच के समान - इस प्रकार योगी नाना वेश धारण कर पृथ्वी पर घूमता रहता है। योगी लोककल्याण के लिये भोग करता है। वे स्वयं की अपनी इच्छा से भोगों को नहीं भोगते हैं। वे लोगों को अनुगृहीत करते हुए इस पृथ्वी पर क्रीड़ा करते हैं।
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