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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 63
असन्त इव भाषन्ते चरन्त्यज्ञा इव प्रिये । पामरा इव दृश्यन्ते कुलयोग विशारदाः ॥ जना यथावमन्यन्ते गच्छेयुर्नैव सङ्गतिम् । न किश्चिदपि भाषन्ते तथा योगी प्रवर्त्तते ॥ मुक्तोऽपि बालवत् क्रीडेत् कुलेशो जडवच्चरेत् । वदेदुन्मत्तवद्विद्वान् कुलयोगी महेश्वरि ॥ यथा हसति लोकोऽयं जुगुप्सति च कुत्सति । विलोक्य दूरतो याति तथा योगी प्रवत्र्त्तते ॥
हे प्रिये! 'कुलयोग' के मर्मज्ञ असन्त के समान बोलते हैं, मूर्खी के समान घूमते फिरते हैं और पापियों के समान दिखाई देते हैं। जिससे लोग उनकी उपेक्षा करें और उन्हें किसी सङ्ग में न पड़ना पड़े। वे कुछ भी नहीं बोलते । ऐसा योगी आचरण करते हैं। क्योंकि वे वस्तुतः योगी होते हैं। हे महेश्वरि! मुक्त होते हुए भी वे बच्चे के समान क्रीड़ा करते हैं, मूर्ख के समान आचरण करते हैं और उन्मत्त के समान बात करते हैं। जिससे लोग हँसें, निन्दा करें और दूर से ही देखकर चले जायें - ऐसा आचरण योगी करते हैं।
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