निष्पन्दकरणग्रामः स्वात्मलीनमनोऽनिलः ।
य आस्ते मृतवत्साक्षात् जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥
इन्द्रियसमूह को निष्क्रिय रखकर अपनी आत्मा में मन को जो लीन रखता हुआ मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है।
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