न हि ध्यानात् परो मन्त्रो न देवस्त्वात्मनः परः ।
नानुसन्धात् परा पूजा न हि तृप्तेः परं फलम् ॥
न ध्यान से श्रेष्ठ मन्त्र है, न आत्मा से श्रेष्ठ देवता है, न अनुसन्धान से श्रेष्ठ पूजा है और न तृप्ति से श्रेष्ठ कोई फल है।
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