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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 107
कौलिकेन्द्रे सकृद्भुक्ते पुण्यं कोटिगुणं भवेत् । किं पुनर्बहुभिर्भुक्तस्तत् पुण्यं नैव गण्यते ॥
कौलिकेन्द्र के एक बार भोजन करने से दाता का पुण्य कोटि गुना अधिक हो जाता है। फिर उसके बहुत बार भोजन करने के पुण्य की तो गणना ही नहीं हो सकती।
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