न शृणोति न चाघ्राति न स्पृशति न पश्यति । न जानाति सुखं दुःखं न सङ्कल्पयते मनः ॥
न चापि किञ्चिज्जानाति न च बुध्यति काष्ठवत् । एवं शिवे विलीनात्मा समाधिस्थ इहोच्यते ॥
वह साधक जो न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्पर्श करता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन में कोई सङ्कल्प होता है, न कुछ भी जानता है और न काष्ठवत् कुछ अनुभव करता है - इस प्रकार जो शिव में अपनी आत्मा को लीन रखता है, वह संसार में 'समाधिस्थ' कहा जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।