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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 13
न शृणोति न चाघ्राति न स्पृशति न पश्यति । न जानाति सुखं दुःखं न सङ्कल्पयते मनः ॥ न चापि किञ्चिज्जानाति न च बुध्यति काष्ठवत् । एवं शिवे विलीनात्मा समाधिस्थ इहोच्यते ॥
वह साधक जो न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्पर्श करता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन में कोई सङ्कल्प होता है, न कुछ भी जानता है और न काष्ठवत् कुछ अनुभव करता है - इस प्रकार जो शिव में अपनी आत्मा को लीन रखता है, वह संसार में 'समाधिस्थ' कहा जाता है।
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