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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 100
कुलनिष्ठान् परित्यज्य यच्चान्यस्मै प्रदीयते। तहानं निष्फलं देवि दाता च नरकं व्रजेत् ॥ भिन्नभाण्डे जलं यद्वत् शिलायामुप्तबीजवत् । भस्मनीव हुतं हव्यं तद्वद्दानमकौलिके ॥
हे देवि! कुलनिष्ठों को छोड़कर जो अन्य को दान देता है, उसका वह दान निष्फल होता है और दान देने वाला नरक में जाता है। टूटे हुए बर्तन में जल, चट्टान में बोए हुये बीज और राख में किए गये हवन के समान अकौलिक को दिया गया दान व्यर्थ होता है।
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