यत्र यत्र गजो याति तत्र मार्गों यथा भवेत् ।
कुलयोगी वरेद् यत्र स स मार्गः कुलेश्वरि ॥
जैसे हाथी जिधर जाता है, उधर ही मार्ग बन जाता है, वैसे ही कुलयोगी जैसा आचरण करता है, हे कुलेश्वरि! वही दूसरों के लिए मार्गदर्शक होता है।
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