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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 81
संस्मृतः कीर्त्तितो दृष्टो वन्दिनो भाषितोऽपि वा । पुनाति कुलधर्मिष्ठश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया ॥
स्मरण करने से, कीर्तिगान से, दर्शन करने से, वन्दना करने से और वार्तालाप से कुलधर्मिष्ठ साधक इच्छा मात्र से चाण्डाल को भी पवित्र बना देता है।
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