निःसङ्कल्पो निर्विकल्पो निर्लिप्तोपाधिवासनः ।
निजस्वरूपनिर्मग्नः स योगी परतत्त्ववित् ॥
सङ्कल्प-विकल्प से रहित और उपाधि-वस्त्रादि से उदासीन, अपने स्वरूप में तल्लीन, परम तत्त्व का ज्ञाता 'योगी' है।
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