यथा गाढान्धकारस्थो न किञ्चिदिह पश्यति ।
अलक्ष्यञ्च तथा योगी प्रपञ्चं नैव पश्यति ॥
जिस प्रकार गहरे अँधेरे में यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, उसी प्रकार अन्यमनस्क योगी प्रपञ्च को नहीं देखता।
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