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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 68
यथाऽऽचरन्ति देवेशि कुलज्ञानविशारदाः । तदेव विदुषां मान्यमात्मनो हितका‌ङ्क्षिणाम् ॥
हे देवेशि! कुलज्ञान के मर्मज्ञ जिस प्रकार आचरण करते हैं, उसी को आत्मकल्याणेच्छु विद्वान् आदर देते हैं।
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