पञ्चमुद्रासमुत्पन्नपरमानन्दनिर्भरः ।
य आस्ते स तु योगीन्द्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
पञ्चमुद्राओं (द्रव्यों) से उत्पन्न परमानन्द में मग्न रहने वाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा को अपने में देखता रहता है।
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