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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 33
उत्तमा तत्त्वचिन्ता स्याज्जपचिन्ता तु मध्यमा । शास्त्रचिन्ताऽधमा ज्ञेया लोकचिन्ताऽधमाधमा ॥ पूजाकोटिसमं स्तोत्रं स्तोत्रकोटिसमो जपः । जपकोटिसमं ध्यानं ध्यानकोटिसमो लयः ॥
तत्त्व का चिन्तन करना उत्तम है। जप की चिन्ता करना मध्यम है। शास्त्र की चिन्ता करना अधम और संसार की चिन्ता करना अधम से भी अधम है। कोटि पूजाओं के बराबर स्तोत्रपाठ है, कोटि स्तोत्रपाठ के बराबर जप है, कोटि जप के बराबर ध्यान है और कोटि ध्यान के बराबर लय (समाधि) है।
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