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कुलार्णव • अध्याय 9 • श्लोक 118
फलं प्राप्य यथा वृक्षः पुष्यं त्यजति निस्पृहः । तत्त्वं प्राप्य तथा योगी त्यजेत् कर्मपरिग्रहम् ॥
जिस प्रकार फल को पाकर निस्पृह वृक्ष फूल को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार तत्त्व को पाकर योगी कर्मानुष्ठान का त्याग करते हैं।
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