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अध्याय 2 — दूसरा अध्याय

वृत्रगीता
66 श्लोक • केवल अनुवाद
शुक्राचार्य ने कहा - तात! आकाशसहित यह सारी पृथ्वी जिनकी भुजाओं के बल पर स्थित है, महान् प्रभावशाली उन भगवान् विष्णुदेव को नमस्कार है।
दानवश्रेष्ठ! जिनका मस्तक और स्थान भी अनन्त है, उन भगवान् विष्णु का उत्तम माहात्म्य मैं तुम्हें बताऊँगा।
शुक्राचार्य और वृत्रासुर में ये बातें हो ही रही थीं कि वहाँ महामुनि धर्मात्मा सनत्कुमार उनके संशय का निवारण करने के लिये आ पहुँचे।
राजन्! असुरराज वृत्र और मुनि शुक्राचार्य के द्वारा पूजित हो मुनिवर सनत्कुमार एक बहुमूल्य सिंहासन पर विराजमान हुए।
जब महाज्ञानी सनत्कुमार आराम से बैठ गये, तब शुक्राचार्य ने उनसे कहा - 'भगवन्! आप इस दानवराज को भगवान् विष्णु का उत्तम माहात्म्य बताइये।'
यह सुनकर सनत्कुमारजी ने बुद्धिमान् दानवराज वृत्रासुर के प्रति भगवान् विष्णु की महिमा से युक्त यह सार्थक वचन कहा-
शत्रुओं को सन्ताप देने वाले दैत्य! भगवान् विष्णु का यह सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य सुनो - तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि यह समस्त संसार भगवान् विष्णु में ही स्थित है।
पर महाबाहो! ये श्रीविष्णु ही सम्पूर्ण चराचर प्राणिसमुदाय की सृष्टि करते हैं और ये ही समय आने पर उसका विनाश करते हैं एवं समय आने पर पुनः सृष्टि भी करते हैं।
समस्त प्राणी इन्हीं में लय को प्राप्त होते हैं और इन्हीं से प्रकट भी होते हैं। इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञ के द्वारा भी नहीं पा सकता। केवल इन्द्रियों के संयम से ही उनकी उपलब्धि हो सकती है।
जो बाह्य (यज्ञ आदि) और आभ्यन्तर (शम, दम आदि) कर्मों में प्रवृत्त होकर मन के विषय में स्थिरता प्राप्त करके अर्थात् मन को स्थिर करके बुद्धि के द्वारा उसे निर्मल बनाता है, वह परलोक में अक्षय सुख (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
जैसे सोनार बारम्बार किये हुए अपने महान् प्रयत्न के द्वारा चाँदी को आग में डालकर उसे शुद्ध करता है, उसी प्रकार जीव सैकड़ों जन्मों में अपने मन को शुद्ध कर पाता है।
परंतु इस यज्ञ आदि और शम-दम आदि कर्मों द्वारा यदि वह महान् प्रयत्न करे तो एक ही जन्म में शुद्ध हो जाता है।
जैसे अपने शरीर में लगी हुई थोड़ी-सी धूल को मनुष्य साधारण चेष्टा से खेल-खेल में ही झाड़-पोंछ देता है, उसी प्रकार बारम्बार किये हुए महान् प्रयत्न से वह अपने राग-द्वेष आदि दोषों को भी दूर कर सकता है।
जैसे थोड़े-से पुष्प एवं माला द्वारा वासित किया हुआ तिल और सरसों का तेल अपनी गन्ध नहीं छोड़ता है, उसी प्रकार थोड़े-से प्रयत्न से न तो दोष दूर होते हैं और न सूक्ष्म ब्रह्म का साक्षात्कार ही हो पाता है।
वही तिल या सरसों का तेल बहुत-से सुगन्धित पुष्पों द्वारा बारम्बार वासित होने पर अपनी गन्ध को छोड़ देता है और उस फूल की गन्ध में ही स्थित हो जाता है।
उसी प्रकार सैकड़ों जन्मों में स्त्री-पुत्र आदि के संसर्ग से युक्त तथा सत्त्व, रज और तम - इन तीनों गुणों द्वारा प्रवर्तित दोषसमूह बुद्धि तथा अभ्यासजनित यत्न से निवृत्त हो पाता है।
दनुनन्दन! कर्म से अनुरक्त और कर्म से विरक्त होने वाले प्राणिसमूह जिस प्रकार राग और विराग के हेतुभूत विभिन्न कर्मों को प्राप्त होते हैं, वह सुनो!
प्रभो! जिस प्रकार वे कर्म में प्रवृत्त होते तथा जिस निमित्त से उसमें स्थित होते हैं और जिस अवस्था में उससे निवृत्त हो जाते हैं, वह सब मैं तुमसे क्रमशः बताऊँगा। तुम उसे यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो!
श्रीमान् भगवान् नारायण हरि आदि और अन्त से रहित हैं। वे ही चराचर प्राणियों की रचना करते हैं।
वे ही सम्पूर्ण प्राणियों में क्षर और अक्षररूप से विद्यमान हैं। ग्यारह इन्द्रियों का जो वैकारिक सर्ग है, वह भी उन्हीं का स्वरूप है। वे अपनी चैतन्यमयी किरणों द्वारा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हो रहे हैं। विमर्श - श्रीविष्णुपुराण में तीन प्रकार की प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है - पहली महत्तत्त्व की सृष्टि है, जिसे यहाँ 'क्षर' शब्द से कहा गया है। दूसरी भूत-सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओं की सृष्टि है। यहाँ 'भूतेषु' पद के द्वारा उसी की ओर संकेत किया गया है। 'एकादशविकारात्मा' इस पद के द्वारा तीसरी सृष्टि का निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन - इन ग्यारह तत्त्वों की रचना हुई है।
दैत्यराज! पृथ्वी को भगवान् विष्णु के दोनों चरण समझो, स्वर्ग-लोक को मस्तक जानो, ये चारों दिशाएँ उनकी चार भुजाएँ हैं, आकाश कान है, तेजस्वी सूर्य उनका नेत्र है, मन चन्द्रमा है, बुद्धि (महत्तत्त्व) उनकी नित्य ज्ञानवृत्ति है और जल रसनेन्द्रिय है।
दानवप्रवर! सम्पूर्ण ग्रह उनकी दोनों भौंहों के बीच में स्थित हैं। नक्षत्रमण्डल नेत्रों से प्रकट हुआ है। दनुनन्दन! यह पृथ्वी उनके दोनों चरणों में स्थित है।
उन्हें तुम सम्पूर्ण भूतस्वरूप, इस जगत्‌ का आदिकारण और परमेश्वर समझो। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण - इन तीनों को नारायणमय ही मानो। तात! समस्त आश्रमों का फल वे ही हैं। विद्वान् पुरुष समस्त कर्मों द्वारा प्राप्तव्य फल उन्हीं को मानते हैं।
कर्मों का त्यागरूप जो संन्यास है, उसका फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। वेद-मन्त्र उनके रोम हैं तथा प्रणव उनकी वाणी है।
बहुत-से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं। हृदय में आश्रित धर्म भी उन्हीं का स्वरूप है। वे ही ब्रह्म हैं। वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं। वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं।
श्रुति (वेद), शास्त्र और सोमपात्रसहित सोलह ऋत्विजों वाला यज्ञ भी वे ही हैं। वे ही ब्रह्मा, विष्णु, दोनों अश्विनीकुमार, इन्द्र, मित्र, वरुण, यम और कुबेर हैं। विमर्श - सोलह ऋत्विजों के नाम इस प्रकार हैं - १. ब्रह्मा, २. ब्राह्मणाच्छंसी, ३. आग्नीध्र और ४. पोता - ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता होते हैं। ५. होता, ६. मैत्रावरुण, ७. अच्छावाक और ८. ग्रावस्तोता - ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९. अध्वर्यु, १०. प्रतिप्रस्थाता, ११. नेष्टा और १२. उन्नेता - ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३. उद्‌गात्ना, १४. प्रस्तोता, १५. प्रतिहर्ता तथा १६. सुब्रह्मण्य - ये सामवेद के गायक होते हैं।
उनका दर्शन पृथक् पृथक् होने पर भी वे अपनी एकता को जानते हैं। तुम भी इस सम्पूर्ण जगत्‌ को एक परमात्मदेव के ही अधीन समझो।
दैत्यराज! अनेक रूपों में प्रकट हुए उन परमात्मा की एकता का यह वेद प्रतिपादन करता है। जीव विज्ञान बल से ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है। उस समय उसकी बुद्धि में वह ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है।
कितने ही जीव करोड़ों कल्पों तक स्थावररूप से एक स्थान में स्थित रहते हैं और कितने ही उतने समय तक इधर-उधर विचरते रहते हैं। दैत्यप्रवर! प्रजा की सृष्टि का परिमाण कई हजार बावड़ियों की संख्या के समान है।
वे सारी बावड़ियाँ पाँच सौ योजन चौड़ी, पाँच सौ योजन लम्बी और एक-एक कोस गहरी हों। गहराई इतनी हो कि कोई उनमें प्रवेश न कर सके। तात्पर्य यह कि प्रत्येक बावड़ी बहुत लम्बी-चौड़ी और गहरी हो - उनमें से एक बावड़ी के जल को कोई दिनभर में एक ही बार एक बाल की नोक से उलीचे, दूसरी बार न उलीचे। इस प्रकार उलीचने से उन सारी बावड़ियों का जल जितने समय में समाप्त हो सकता है, उतने ही समय में प्राणियों की सृष्टि और संहार के क्रम की समाप्ति हो सकती है (अर्थात् जैसे उक्त प्रकार से उलीचने पर उन बावड़ियों का जल सूखना असम्भव है, वैसे ही बिना ज्ञान के संसार का उच्छेद होना असम्भव है।)
प्राणियों के वर्ण छः प्रकार के हैं - कृष्ण, धूम्र, नील, रक्त, हरिद्रा (पीला) और शुक्ल । इनमें से कृष्ण, धूम्र और नील वर्ण का सुख मध्यम होता है। रक्तवर्ण विशेष रूप से सहन करने योग्य होता है। हरिद्रा की-सी कान्ति सुख देने वाली होती है और शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है। विमर्श - जब तमोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और रजोगुण की सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टि का रंग माना गया है। तमोगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और सत्त्वगुण की सम अवस्था होने पर धूम्रवर्ण होता है। यह पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेने वाले प्राणियों का वर्ण माना गया है। रजोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था होने पर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्ग का वर्ण बताया गया है। इसी में जब सत्त्वगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्वगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था हो तो हरिद्रा के समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओं का वर्णन है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसी में जब रजोगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसी को कौमारसर्ग कहा गया है।
दानवराज! शुक्लवर्ण निर्मल, शोकहीन, परिश्रमशून्य होने के कारण सिद्धिकारक होता है। दितिकुलनन्दन! जीव सहस्रों योनियों में जन्म ग्रहण करने के बाद मनुष्य योनि में आकर कभी सिद्धि-लाभ करता है।
असुरेन्द्र! देवराज इन्द्र ने मंगलमय तत्त्वज्ञान प्राप्त करके हमारे निकट जिस गति और दर्शन-शास्त्र का वर्णन किया है, वह प्राणियों की वर्णजनित गति है अर्थात् शुक्लवर्ण वालों को वही सिद्धि प्राप्त होती है। वह वर्ण कालकृत माना गया है।
दैत्यप्रवर! इस जगत्में समस्त जीव-समुदाय की परागति चौदह लाख बतायी गयी है। (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये चौदह करण हैं। इन्हीं के भेद से चौदह प्रकार की गति होती है। फिर विषयभेद से वृत्तिभेद होने के कारण चौदह लाख प्रकार की गति होती है।) जीव का जो ऊर्ध्व लोकों में गमन होता है, वह भी उन्हीं चौदह करणों द्वारा सम्पादित होता है। विभिन्न स्थानों में जो स्थिरतापूर्वक निवास है, वह और उन स्थानों से जो उन जीवों का अधःपतन होता है, वह भी उन्हीं के सम्बन्ध से होता है। इस बात को तुम अच्छी तरह जान लो (अतः इन चौदह करणों को सात्त्विक मार्गाभिमुखी बनाना चाहिये)।
कृष्णवर्ण की गति नीच बतायी गयी है। वह नरक प्रदान करने वाले निषिद्ध कर्मों में आसक्त होता है, इसीलिये नरक की आग में पकाया जाता है। वह कुमार्ग में प्रवृत्त हुए पूर्वोक्त चौदह करणों द्वारा पापाचार करने के कारण अनेक कल्पों तक नरक में ही निवास करता है - ऐसा ऋषि-मुनि कहते हैं।
तदनन्तर वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षों तक) नरक में विचरण करके फिर धूम्रवर्ण पाता है (पशु-पक्षी आदि की योनि में जन्म लेता है)। उस योनि में भी वह विवश होकर बड़े दुःख से निवास करता है। फिर युगक्षय होने पर वह तप (पुरातन पुण्यकर्म या विवेक) के प्रभाव से सुरक्षित होकर उस संकट से उद्धार पा जाता है।
वही जीव जब सत्त्वगुण से युक्त होता है, तब अपनी बुद्धि के द्वारा तमोगुण की प्रवृत्ति को दूर हटाता हुआ अपने कल्याण के लिये प्रयत्न करता है। उस समय सत्त्वगुण के बढ़ जाने पर वह रक्तवर्ण को प्राप्त होता है (इसी को अनुग्रह सर्ग कहा गया है, चित्त की विभिन्न वृत्तियों पर अनुग्रह करने वाले देवविशेष का ही नाम 'अनुग्रह' है)। जब सत्त्वगुण में कुछ कमी रह जाती है, तब वह जीव नीलवर्ण को प्राप्त होकर मनुष्य लोक में आवागमन करने लगता है।
तत्पश्चात् वह मनुष्यलोक में एक कल्प तक स्वधर्मजनित बन्धनों से 'बँधकर क्लेश उठाता हुआ जब धीरे-धीरे अपनी तपस्या को बढ़ाता है, तब हल्दी की-सी कान्तिवाले पीतवर्ण- देवताभाव को प्राप्त होता है। वहाँ भी सैकड़ों कल्प व्यतीत कर लेने पर वह पुनः पुण्यक्षय के पश्चात् मनुष्य होता है (इस प्रकार वह देवता से मनुष्य और मनुष्य से देवता होता रहता है)।
हे दितिपुत्र! सहस्त्रों कल्पों तक देवरूप से विचरते रहने पर भी जीव विषयभोग से मुक्त नहीं होता तथा प्रत्येक कल्प में किये हुए अशुभ कर्मों के फलों को नरक में रहकर भोगता हुआ जीव उन्नीस हजार विभिन्न गतियों को प्राप्त होता है। तत्पश्चात् उसे नरक से छुटकारा मिलता है। मनुष्य के सिवा अन्य सभी योनियों में केवल सुख-दुःख के भोग प्राप्त होते हैं। मोक्ष का सुयोग हाथ नहीं लगता है। इस बात को तुम्हें भलीभाँति समझ लेना चाहिये। विमर्श - दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण - ये उन्नीस भोग के साधन हैं, विषय और वृत्तियों के भेद से इन्हीं के उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं।
वह जीव निरन्तर देवलोक में विहार करता है और वहाँ से भ्रष्ट होने पर मनुष्य योनि को प्राप्त होता है। मर्त्यलोक में वह आठ सौ कल्पों तक बारम्बार जन्म लेता रहता है। तत्पश्चात् शुभकर्म करके वह पुनः देवभाव को प्राप्त करता है (यह आवागमन का चक्र तभी तक चलता है, जब तक जीव को परमज्ञान या अनन्य भक्ति की प्राप्ति नहीं हो जाती, उसकी प्राप्ति होने पर तो वह मुक्त या परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।)
असुरों के प्रमुख वीर! वह जीव कालक्रम से अशुभ कर्म करके कभी-कभी मर्त्यलोक से भी नीचे गिर जाता है और सबसे निकृष्ट, तलप्रदेश की भाँति निम्नतम, कृष्णवर्ण (स्थावर योनि) में जन्म ग्रहण करके स्थित होता है। इस प्रकार उत्थान-पतन के चक्र में पड़े हुए इस जीवसमूह को जिस प्रकार सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
क्रमशः रक्तवर्ण (अनुग्राहक देवता), हरिद्रावर्ण (देवता) तथा शुक्लवर्ण (सनकादिकुमारों-जैसा सिद्ध शरीरधारी) होकर वह जीव बारी-बारी से सात सौ दिव्य शरीरों का आश्रय ले भू आदि सात उत्तमोत्तम लोकों में विचरण करके पूर्व पुण्य के प्रभाव से वेगपूर्वक विशुद्ध ब्रह्मलोक में चला जाता है।
महानुभाव वृत्रासुर! प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ - ये आठ तथा दूसरे साठ तत्त्व और इनकी जो सैकड़ों वृत्तियाँ हैं - ये सब महातेजस्वी योगियों के मन के द्वारा अवरुद्ध की हुई होती हैं तथा सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों को भी वे अवरुद्ध कर देते हैं। अतः शुक्लवर्ण वाले (सनकादिकों के समान सिद्ध) पुरुष को जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वही उन योगियों को मिलती है। विमर्श - पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय - ये दस इन्द्रियाँ सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद से प्रत्येक छः-छः प्रकार की होती हैं। इस प्रकार इनके साठ भेद हो जाते हैं।
किंतु जो भलीभाँति योग-साधन में असमर्थ है, वह योगभ्रष्ट पुरुष सौ कल्पों तक ऊपर के सात लोकों में निवास करता है। फिर बचे हुए कर्म-संस्कारों के सहित वहाँ से लौटकर मनुष्यलोक में पहले से बढ़कर महत्त्व-सम्पन्न हो मनुष्य शरीर को पाता है।
तदनन्तर मनुष्ययोनि से निकलकर वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठ देवादि योनियों की ओर अग्रसर होता है एवं सातों लोकों में प्रभावशाली होकर एक कल्प तक निवास करता है।
फिर वह योगी भू आदि सात लोकों को विनाशशील, क्षणभंगुर समझकर पुनः मनुष्यलोक में भलीभाँति (शोकमोह से रहित होकर) निवास करता है। तदनन्तर शरीर का अन्त होने पर वह अव्यय (अविनाशी या निर्विकार) एवं अनन्त (देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेद से शून्य) स्थान (परब्रह्मपद) को प्राप्त होता है। वह अव्यय एवं अनन्त स्थान किसी के मत में महादेवजी का कैलासधाम है। किसी के मत में भगवान् विष्णु का वैकुण्ठधाम है। किसी के मत में ब्रह्माजी का सत्यलोक है। कोई-कोई उसे भगवान् शेष या अनन्त का धाम बताते हैं। कोई वह जीव का ही परमधाम है - ऐसा कहते हैं और कोई-कोई उसे सर्वव्यापी चिन्मय प्रकाश से युक्त परब्रह्म का स्वरूप बताते हैं।
ज्ञानाग्नि के द्वारा जिनके सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीर दग्ध हो गये हैं, वे प्रजाजन अर्थात् योगी लोग प्रलयकाल में सदा परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं एवं जो ब्रह्मलोक से नीचे के लोकों में रहने वाले साधनशील दैवी प्रकृति से सम्पन्न साधक हैं, वे सब परब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं।
प्रलयकाल में जो जीव देवभाव को प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलों का उपभोग समाप्त करने से पहले ही लय को प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तर में पुनः प्रजा की सृष्टि होने पर वे शेष फल का उपभोग करने के लिये उन्हीं स्थानों को प्राप्त होते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्प में प्राप्त थे; किंतु जो कल्पान्त में उस योनिसम्बन्धी कर्मफल-भोग को पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोक का नाश हो जाने पर दूसरे कल्प में उनके जैसे कर्म हैं, उसी के सदृश अन्य प्राणियों की भाँति मनुष्य-योनि को ही प्राप्त होते हैं।
जो योगी सिद्धलोक से गिरकर मृत्युलोक में आये हैं, उनके समान साधनबल से सम्पन्न जो अन्य योगी हैं, वे भी एक लोक से दूसरे लोक में ऊपर उठते हुए क्रमशः उन सिद्ध पुरुषों की ही गति को प्राप्त होते हैं। परंतु जो वैसे नहीं हैं, वे विपरीतभाव के कारण अपनी-अपनी गति को प्राप्त होते हैं।
विशुद्धभाव से सम्पन्न सिद्ध पुरुष जब तक पंचेन्द्रियरूप इस करणसमुदाय का संयम करके शेष प्रारब्ध कर्म का उपभोग करता है, तब तक उसके शरीर में समस्त प्रजागणों का अर्थात् इन्द्रियों के देवताओं का तथा अपरा और परा विद्या का निवास रहता है।
जो साधक सदा शुद्ध मन से उस विशुद्ध परमगति का अनुसन्धान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपद को प्राप्त करके वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है।
उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायण का बल एवं प्रभाव बताया है।
वृत्रासुर बोला - उदारचित्त महात्मा सनत्कुमारजी! यदि ऐसी बात है तो मुझे कोई विषाद नहीं है। मैं आपके वचन को अच्छी तरह समझता और इसे यथार्थ मानता हूँ। आज मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आपकी इस वाणी को सुनकर मेरे सारे पाप और कलुष दूर हो गये।
भगवन्! महर्षे! महातेजस्वी, अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान् विष्णु का यह अमित शक्तिशाली संसार चक्र चल रहा है। यह भगवान् विष्णु का वह सनातन स्थान है, जहाँ से सारी सृष्टियों का आरम्भ होता है। महात्मा विष्णु पुरुषोत्तम हैं। उन्हीं में यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है।
भीष्मजी कहते हैं - कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुर ने अपने आत्मा को परमात्मा में लगाकर उन्हीं का ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वर के परमधाम को प्राप्त कर लिया।
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! पूर्वकाल में महात्मा सनत्कुमार ने वृत्रासुर से जिनके स्वरूप का वर्णन किया था, वे भगवान् विष्णु - ये हमारे जनार्दन श्रीकृष्ण ही तो हैं?
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! मूल कारणरूप से स्थित, महान् देव, महामनस्वी भगवान् नारायण हैं। वे अपने उस चिन्मय स्वरूप में स्थित होकर अपने प्रभाव से नाना प्रकार के सम्पूर्ण पदार्थों की सृष्टि करते हैं।
अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले इन भगवान् श्रीकृष्ण को तुम उन श्रीनारायण के एक चतुर्थ अंश से सम्पन्न समझो। बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपने उस चतुर्थ अंश से ही तीनों लोकों की रचना करते हैं।
जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकाल में भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्त में जल के भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकों में विचरण करते हैं।
अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणों को सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकों में विचरण करते हैं। उन महापुरुष की गति को कोई रोक नहीं सकता। वे ही इस जगत्‌ की सृष्टि करते हैं। उन्हीं में यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है।
युधिष्ठिर ने कहा - परमार्थतत्त्व के ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुर ने आत्मा के शुभ एवं यथार्थ स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया था; इसीलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था।
निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुल में उत्पन्न हुआ था और स्वभाव से भी शुद्ध था। जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसीलिये पुनः संसार में नहीं लौटा। वह पशु-पक्षियों की योनि तथा नरक से छुटकारा पा गया।
पृथ्वीनाथ! पीतवर्ण वाले देवसर्ग में तथा रक्तवर्ण वाले अनुग्रहसर्ग में विद्यमान प्राणी कभी तामस कर्मों से आवृत होकर तिर्यग्योनि का भी दर्शन कर सकता है।
हम लोग तो और भी अधिक आपत्ति से घिरे हुए हैं। दुःख-सुख से मिश्रित भाव में अथवा केवल दुःखमय भाव में आसक्त हैं। ऐसी दशा में पता नहीं हमें किस गति की प्राप्ति होगी? हम नीलवर्ण वाली मानव-योनि में पड़ेंगे या कृष्णवर्ण वाली स्थावर योनि से भी हीनदशा को जा पहुँचेंगे।
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुल से सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतों का भलीभाँति पालन करने वाले हो; अतः देवताओं के लोकों में विहार करके पुनः मनुष्य-शरीर को ही प्राप्त करोगे।
तुम सब लोग यथासमय सुख से सन्तानोत्पादन करके देवलोकों में जाकर सुख भोगोगे। तत्पश्चात् सुखपूर्वक सिद्धि प्राप्त करके सिद्धों में गिने जाओगे। तुम्हारे मन में दुर्गति का भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि तुम सब लोग निर्मल एवं निष्पाप हो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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