अध्याय 2 — दूसरा अध्याय
वृत्रगीता
66 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रुति (वेद), शास्त्र और सोमपात्रसहित सोलह ऋत्विजों वाला यज्ञ भी वे ही हैं। वे ही ब्रह्मा, विष्णु, दोनों अश्विनीकुमार, इन्द्र, मित्र, वरुण, यम और कुबेर हैं।
विमर्श - सोलह ऋत्विजों के नाम इस प्रकार हैं - १. ब्रह्मा, २. ब्राह्मणाच्छंसी, ३. आग्नीध्र और ४. पोता - ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता होते हैं। ५. होता, ६. मैत्रावरुण, ७. अच्छावाक और ८. ग्रावस्तोता - ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९. अध्वर्यु, १०. प्रतिप्रस्थाता, ११. नेष्टा और १२. उन्नेता - ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३. उद्गात्ना, १४. प्रस्तोता, १५. प्रतिहर्ता तथा १६. सुब्रह्मण्य - ये सामवेद के गायक होते हैं।
प्राणियों के वर्ण छः प्रकार के हैं - कृष्ण, धूम्र, नील, रक्त, हरिद्रा (पीला) और शुक्ल । इनमें से कृष्ण, धूम्र और नील वर्ण का सुख मध्यम होता है। रक्तवर्ण विशेष रूप से सहन करने योग्य होता है। हरिद्रा की-सी कान्ति सुख देने वाली होती है और शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है।
विमर्श - जब तमोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और रजोगुण की सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टि का रंग माना गया है। तमोगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और सत्त्वगुण की सम अवस्था होने पर धूम्रवर्ण होता है। यह पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेने वाले प्राणियों का वर्ण माना गया है। रजोगुण की अधिकता, सत्त्वगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था होने पर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्ग का वर्ण बताया गया है। इसी में जब सत्त्वगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्वगुण की अधिकता, रजोगुण की न्यूनता और तमोगुण की सम अवस्था हो तो हरिद्रा के समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओं का वर्णन है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसी में जब रजोगुण की सम अवस्था और तमोगुण की न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसी को कौमारसर्ग कहा गया है।