हे अनघ(निष्पाप पितामह)! जो जीव शुक्ल वर्ण और शुक्लाभिजाति(परम शुद्ध आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त कर लेता है, वह साध्य पद को प्राप्त होकर पुनः संसार में नहीं लौटता।
हे पितामह! वह तिर्यक् योनियों तथा नरक की गतियों से भी पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
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