दैवानि स व्यूहशतानि सप्त रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः ।
संश्रित्य सन्धावति शुक्लमेत-मष्टावरानर्च्यतमान् स लोकान् ॥
रक्त, हारिद्र और तत्पश्चात् शुक्ल वर्ण को प्राप्त जीव, देवसम्बन्धी सात सौ व्यूहों(उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं एवं लोकों के क्रम) का अनुभव करता है।
इसके उपरान्त, वह शुक्ल वर्ण की परम अवस्था का आश्रय लेकर, अत्यन्त पूजनीय आठ श्रेष्ठ लोकों का अतिक्रमण करता हुआ आगे बढ़ता है।
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