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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 42
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः । संश्रित्य सन्धावति शुक्लमेत-मष्टावरानर्च्यतमान् स लोकान् ॥
क्रमशः रक्तवर्ण (अनुग्राहक देवता), हरिद्रावर्ण (देवता) तथा शुक्लवर्ण (सनकादिकुमारों-जैसा सिद्ध शरीरधारी) होकर वह जीव बारी-बारी से सात सौ दिव्य शरीरों का आश्रय ले भू आदि सात उत्तमोत्तम लोकों में विचरण करके पूर्व पुण्य के प्रभाव से वेगपूर्वक विशुद्ध ब्रह्मलोक में चला जाता है।
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