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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 1
नमस्तस्मै भगवते देवाय प्रभविष्णवे । यस्य पृथ्वीतलं तात साकाशं बाहुगोचरः ॥
उस भगवान्, देवस्वरूप, सर्वशक्तिमान् प्रभु को नमस्कार है, हे तात! जिनके लिए यह पृथ्वीमण्डल और आकाश भी मानो उनकी भुजाओं की पहुँच के भीतर स्थित हैं।
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