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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 45
तस्मादुपावृत्य ततः क्रमेण सोऽग्रेण संतिष्ठति भूतसर्गम् । स सप्तकृत्वश्च परैति लोकान् संहारविक्षेपकृतप्रभावः॥
तदनन्तर मनुष्ययोनि से निकलकर वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठ देवादि योनियों की ओर अग्रसर होता है एवं सातों लोकों में प्रभावशाली होकर एक कल्प तक निवास करता है।
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