स यावदेवास्ति सशेषभुक् ते प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले।
तावत् तदङ्गेषु विशुद्धभावः संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत् ॥
जब तक वह जीव अपने शेष कर्मफल का भोग करता रहता है, तब तक प्रजाएँ, दैवी शक्तियाँ तथा शुक्ल अवस्था से सम्बन्धित दिव्य अनुभूतियाँ उसके साथ रहती हैं।
उस अवधि में, वह विशुद्ध भाव को धारण करके, अपने पाँचों इन्द्रियों के इस रूप को संयम में रखता है।
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