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वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 38
स तत्र संहारविसर्गमेकं स्वधर्मजैर्बन्धनैः क्लिश्यमानः । ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं संहारविक्षेपशते व्यतीते ॥
तत्पश्चात् वह मनुष्यलोक में एक कल्प तक स्वधर्मजनित बन्धनों से 'बँधकर क्लेश उठाता हुआ जब धीरे-धीरे अपनी तपस्या को बढ़ाता है, तब हल्दी की-सी कान्तिवाले पीतवर्ण- देवताभाव को प्राप्त होता है। वहाँ भी सैकड़ों कल्प व्यतीत कर लेने पर वह पुनः पुण्यक्षय के पश्चात् मनुष्य होता है (इस प्रकार वह देवता से मनुष्य और मनुष्य से देवता होता रहता है)।
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