युधिष्ठिर उवाच-
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽत्मनो गतिः ।
शुभा तस्मात् स सुखितो न शोचति पितामह ॥
युधिष्ठिर ने कहा - परमार्थतत्त्व के ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुर ने आत्मा के शुभ एवं यथार्थ स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया था; इसीलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था।
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