मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वृत्रगीता • अध्याय 2 • श्लोक 39
हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गात् सहस्त्रशस्तिष्ठति सञ्चरन् वै। अविप्रमुक्तो निरये च दैत्य ततः सहस्त्राणि दशापराणि ॥ गतीः सहस्त्राणि च पञ्च तस्य चत्वारि संवर्तकृतानि चैव। विमुक्तमेनं निरयाच्च विद्धि सर्वेषु चान्येषु च सम्भवेषु ॥
हे दितिपुत्र! सहस्त्रों कल्पों तक देवरूप से विचरते रहने पर भी जीव विषयभोग से मुक्त नहीं होता तथा प्रत्येक कल्प में किये हुए अशुभ कर्मों के फलों को नरक में रहकर भोगता हुआ जीव उन्नीस हजार विभिन्न गतियों को प्राप्त होता है। तत्पश्चात् उसे नरक से छुटकारा मिलता है। मनुष्य के सिवा अन्य सभी योनियों में केवल सुख-दुःख के भोग प्राप्त होते हैं। मोक्ष का सुयोग हाथ नहीं लगता है। इस बात को तुम्हें भलीभाँति समझ लेना चाहिये। विमर्श - दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण - ये उन्नीस भोग के साधन हैं, विषय और वृत्तियों के भेद से इन्हीं के उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें