हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गात् सहस्त्रशस्तिष्ठति सञ्चरन् वै। अविप्रमुक्तो निरये च दैत्य ततः सहस्त्राणि दशापराणि ॥
गतीः सहस्त्राणि च पञ्च तस्य चत्वारि संवर्तकृतानि चैव। विमुक्तमेनं निरयाच्च विद्धि सर्वेषु चान्येषु च सम्भवेषु ॥
हे दैत्य! हारिद्र वर्ण(उच्च एवं सुखमय आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त जीव, सहस्रों सृष्टि-चक्रों तक विभिन्न लोकों में विचरण करता हुआ स्थित रहता है।
तथापि, वह अभी भी पूर्णतः मुक्त नहीं होता और नरक तथा अन्य लोकों के अनुभवों से सम्बन्धित रहता है। इसके पश्चात् भी वह दस सहस्र अन्य चक्रों का अनुभव करता है।
आगे चलकर वह पाँच सहस्र गतियों तथा चार संवर्त-चक्रों(प्रलय और पुनःसृष्टि के महान् चक्रों) का भी अनुभव करता है।
तब, हे दैत्य! उसे नरक तथा अन्य समस्त योनियों और जन्मों से मुक्त हुआ जानो।
(विमर्श: दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण— ये उन्नीस भोग के साधन हैं, विषय और वृत्तियों के भेद से इन्हीं के उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं।)
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वृत्रगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वृत्रगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।